
कभी कभी मैं ये सोचता हूँ
कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो तो ऐसा लगता है कि दूसरी तरफ़ जा रहे हैं
मग़र हकीकत में पेड़ अपनी जगह खड़े हैं
तो क्या ये मुमकिन है
सारी सदियाँ कतार अन्दर कतार अपनी जगह खड़ी हों
ये वक़्त ठहरा हो और हम ही गुज़र रहे हों
मैं ये सोचता हूँ तो क्या ये मुमकिन है
सच ये हो कि सफ़र में हम हैं, गुज़रते हम हैं
जिसे समझते हैं गुज़रता है हम वो थमा है
गुज़रता है, थमा हुआ है, किसे ख़बर है?
किसे पता है कि ये वक़्त क्या है?
- जावेद अख्तर
The World Heritage site, Kalka Shimla Train of Himachal.
Tarun Chandel
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